सतपुड़ा एक्सप्रेस छिंदवाड़ा। विकासखंड मोहखेड़ के ग्राम चारगांव करबल में जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम का असर अब किसानों की आदतों में साफ दिखने लगा है। मध्य प्रदेश सरकार ,कृषि विभाग और BISA (बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया) के सहयोग से खेतों में प्रदर्शित की गई ‘जीरो टिलेज’ (बिना जुताई) तकनीक अब केवल प्रक्षेत्र प्रदर्शन का हिस्सा नहीं रही, बल्कि किसान इसे अपनी खेती का स्थायी हिस्सा बना चुके हैं।शुरुआत में गेहूं, मूंग , मक्का और सोयाबीन की फसल में इस तकनीक का प्रदर्शन किया गया था।
इसके व्यावहारिक लाभ और नमी संरक्षण को समझने के बाद, अब किसान बिना किसी सरकारी अनुदान के चना और सरसों जैसी फसलों में भी जीरो टिलेज सीड ड्रिल से स्वयं बुवाई कर रहे हैं। कम बारिश और जलवायु परिवर्तन के दौर में यह तकनीक मिट्टी की नमी बचाने और लागत कम करने में बेहद कारगर साबित हो रही है।गांव के युवा किसान अमित कुमार भादे ने बताया कि पिछले दो वर्षों में BISA के सहयोग से उन्होंने मक्का, सोयाबीन ओर गेहूं में इसके अच्छे परिणाम देखे थे। इस वर्ष पानी की कमी को देखते हुए, उन्होंने बिना किसी बाहरी मदद के स्वयं जीरो टिलेज मशीन से सरसों की बुवाई की है।चारगांव करबल की यह सफलता साबित करती है कि जब किसान किसी तकनीक के परिणाम खुद देखते हैं, तो वे उसे स्वेच्छा से अपना लेते हैं। पारंपरिक खेती से हटकर संसाधन-संरक्षण की दिशा में उठाया गया किसानों का यह कदम आने वाले समय में अन्य गांवों के लिए एक बेहतरीन और टिकाऊ उदाहरण बन गया है।















