सतपुड़ा एक्सप्रेस छिंदवाड़ा।सोयाबीन की फसल के बाद चने की बुवाई करते हुए मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के विकासखंड मोहखेड़ के ग्राम चारगांव करबल के किसान बालकराम भादे लंबे समय से खेती को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाए हुए हैं। वर्षों के कृषि अनुभव के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में मौसम में हो रहे बदलावों ने उनकी खेती को अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया।
बारिश का समय और वितरण बदलना, कई बार लंबे समय तक वर्षा न होना, बढ़ता तापमान और फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं में नमी की कमी जैसी परिस्थितियों ने खेती की लागत और जोखिम दोनों को बढ़ाया। इन परिस्थितियों को देखते हुए श्री बालकराम भादे ने महसूस किया कि बदलते मौसम के साथ खेती की पद्धति में भी बदलाव आवश्यक है।इसी सोच के साथ वर्ष 2024 में वे BISA के जलवायु-अनुकूल कृषि कार्यक्रम से जुड़े।
BISA के तकनीकी मार्गदर्शन और खेत पर किए गए व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से उन्होंने जीरो टिलेज, रेज्ड-बेड प्लांटिंग और डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) जैसी संसाधन-संरक्षण तकनीकों को समझना और अपनाना शुरू किया। शुरुआत में उन्होंने इन तकनीकों को अपने खेत की परिस्थितियों के अनुसार अपनाकर उनके परिणामों को देखा। धीरे-धीरे उनका विश्वास बढ़ा और जीरो टिलेज उनके लिए केवल एक नई मशीन आधारित तकनीक न रहकर जलवायु जोखिम को कम करने और खेती की लागत घटाने की रणनीति बन गई।श्री बालकराम भादे ने खेती में फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया।
फसल कटाई के बाद अवशेषों को जलाने या खेत से बाहर करने के बजाय उन्होंने उन्हें खेत में ही बनाए रखना शुरू किया। खेत की सतह पर मौजूद अवशेष मिट्टी को प्राकृतिक आवरण प्रदान करते हैं, जिससे मिट्टी की नमी के संरक्षण और तापमान को संतुलित रखने में सहायता मिलती है। साथ ही, अवशेषों के खेत में ही विघटन से जैविक पदार्थ के पुनर्चक्रण को बढ़ावा मिलता है। इस बदलाव से उन्होंने महसूस किया कि फसल अवशेष कोई बेकार सामग्री नहीं, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और अगली फसल के लिए उपयोगी प्राकृतिक संसाधन हैं।जलवायु अनुकूल तकनीकों को लगातार अपनाने के साथ श्री बालकराम भादे की खेती में आर्थिक और उत्पादन संबंधी सकारात्मक परिणाम भी दिखाई देने लगे। उनके अनुभव के अनुसार, जीरो टिलेज और अन्य संसाधन-संरक्षण तकनीकों को अपनाने के बाद फसल उत्पादकता में लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
वहीं खेत की तैयारी और जुताई से संबंधित खर्च में लगभग ₹2,500 प्रति एकड़ की बचत हुई। जुताई के चक्कर कम होने से डीजल, मशीन संचालन और समय की बचत हुई तथा उपलब्ध संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग संभव हुआ। इन बदलावों ने उनकी खेती को अधिक लाभकारी बनाने के साथ-साथ मौसम से जुड़े जोखिमों को संभालने में भी मदद की।
बालकराम भादे की कृषि प्रणाली में जल संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया। जीरो टिलेज के साथ फसल अवशेषों को खेत में बनाए रखने से मिट्टी की नमी के संरक्षण में सहायता मिली। वहीं रेज्ड-बेड तकनीक के माध्यम से सिंचाई के पानी का अधिक कुशल उपयोग किया गया और DSR के माध्यम से धान की स्थापना में पानी की आवश्यकता को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। उनके खेत के अनुभव के अनुसार इन तकनीकों के संयुक्त उपयोग से सिंचाई जल की लगभग 25–30 प्रतिशत तक बचत हुई। सीमित जल उपलब्धता और अनियमित वर्षा की परिस्थितियों में यह उनके लिए महत्वपूर्ण लाभ है।उन्होंने केवल तकनीक बदलने तक ही अपनी खेती को सीमित नहीं रखा, बल्कि फसल विविधीकरण को भी अपनाया। सोयाबीन, धान, गेहूं, चना और मक्का, एवं सब्जी वर्गीय जैसी विभिन्न फसलों को कृषि प्रणाली में शामिल करने से किसी एक फसल और मौसम पर निर्भरता कम हुई। यदि किसी एक फसल पर मौसम, कीट या बाजार की प्रतिकूल परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है, तो अन्य फसलें किसान की आय और उत्पादन को संतुलित करने में मदद कर सकती हैं। इस प्रकार फसल विविधीकरण ने उनकी खेती को अधिक स्थिर और जलवायु-लचीला बनाने में योगदान दिया।खरीफ 2026 में श्री बालकराम भादे ने अपनी पूरी सोयाबीन फसल जीरो टिलेज तकनीक से बोई। इस दौरान पारंपरिक जुताई किए बिना जीरो टिलेज मशीन से सीधे बुवाई की गई और खेत में उपलब्ध फसल अवशेषों को बनाए रखा गया। इस अनुभव ने उनके विश्वास को और मजबूत किया कि कम जुताई, अवशेष प्रबंधन और समय पर बुवाई जैसी तकनीकें बदलते मौसम में खेती के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।
वर्तमान रबी सीजन में क्षेत्र में कम बारिश और मिट्टी में सीमित नमी की स्थिति ने इन तकनीकों के महत्व को और स्पष्ट किया है। जहां कम नमी के कारण समय पर बुवाई करना चुनौती बन रहा है, वहीं बालकराम भादे उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग करते हुए गेहूं और चने की बुवाई जीरो टिलेज तकनीक से कर रहे हैं। खेत में मौजूद फसल अवशेष और न्यूनतम मृदा हस्तक्षेप उपलब्ध नमी को बनाए रखने में सहायता कर रहे हैं। उनका अनुभव बताता है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में किसान मौसम को नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के माध्यम से मौसम के प्रभाव को कम जरूर कर सकता है।श्री बालकराम भादे की खेती में हुए बदलाव का महत्व केवल उनके व्यक्तिगत खेत तक सीमित नहीं है। लगभग 15 प्रतिशत उत्पादन वृद्धि, ₹2,500 प्रति एकड़ लागत बचत, 25–30 प्रतिशत तक जल बचत, मृदा गुणवत्ता में सुधार, फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन और फसल विविधीकरण के माध्यम से जोखिम में कमी ने उनकी कृषि प्रणाली को अधिक संसाधन-कुशल और जलवायु-लचीला बनाया है।
इन परिणामों ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया है और आसपास के किसानों के लिए भी एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत किया है बालकराम भादे की यात्रा यह दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन के सामने किसान केवल प्रभावित होने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाधान का सक्रिय भागीदार भी हो सकता है। जब वैज्ञानिक तकनीक किसान के अनुभव और स्थानीय परिस्थितियों से जुड़ती है, तो उसका वास्तविक प्रभाव खेत पर दिखाई देता है। वर्ष 2024 में शुरू हुई उनकी यात्रा आज उन्हें ऐसे किसान के रूप में आगे ला रही है, जिसने बदलते मौसम की चुनौती को समझकर अपनी खेती की दिशा बदली है।उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मौसम बदल रहा है, इसलिए खेती का तरीका भी बदलना होगा। जीरो टिलेज, रेज्ड-बेड, DSR, फसल अवशेष प्रबंधन, जल संरक्षण और फसल विविधीकरण जैसे उपाय किसानों को कम संसाधनों में अधिक दक्षता के साथ खेती करने तथा बदलते जलवायु जोखिमों का सामना करने में मदद कर सकते हैं।
“मौसम हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन मौसम के अनुसार खेती करने का फैसला हमारे हाथ में है। मिट्टी और पानी को बचाकर, फसल अवशेषों का सही प्रबंधन करके और नई तकनीक अपनाकर हम बदलते मौसम में भी खेती को सुरक्षित और टिकाऊ बना सकते हैं।”— श्री बालकराम भादे, ग्राम चारगांव करबल, विकासखंड मोहखेड़, जिला छिंदवाड़ा















