प्राकृतिक खेती से कृषक बन रहे आत्मनिर्भरजैविक उत्पाद प्रेमी बन रहे हैं प्रमुख ग्राहक, गुरैया सब्जी मंडी स्थित जैविक हाट में भी किया जा रहा है विक्रय
सतपुड़ा एक्सप्रेस छिन्दवाड़ा/03 सितंबर 2026/ छिंदवाड़ा जिले के किसान रसायनों के हानिकारक दुष्प्रभावों के प्रकृति जागरूक होकर प्राकृतिक खेती को अपनाकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं। विकासखण्ड छिन्दवाडा के ग्राम कुहिया के कृषक शिवचरण कुशवाहा भी उन्हीं जागरूक किसानों में से एक हैं, जो प्राकृतिक खेती से स्वीट कॉर्न उत्पादित कर लाखों की आय प्राप्त कर रहे हैं और जैविक उत्पादों के प्रेमियों को रसायन मुक्त स्वीट कॉर्न का स्वाद चखा रहे हैं। साथ ही पर्यावरण संरक्षण में सहभागी बन रहे हैं।
रसायनों के उपयोग से प्रभावित हुई मृदा उर्वरता – कृषक शिवचरण के पास कुल 4 एकड़ कृषि भूमि एवं 2 देशी गाय हैं। कुछ वर्ष पूर्व वे अपने संपूर्ण खेत में रासायनिक खेती करते थे। रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के लगातार उपयोग से खेती की लागत बढ़ती जा रही थी, साथ ही उन्हें अपने खेत की मृदा उर्वरता में भी कमी महसूस होने लगी थी।
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़े कदम – वर्ष 2018 में कृषक शिवचरण ने यूट्यूब के माध्यम से श्री सुभाष पालेकर जी के प्राकृतिक एवं जैविक खेती से संबंधित वीडियो देखे। इनसे प्रेरित होकर उन्होंने अपने खेत में धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती को अपनाना प्रारंभ किया।
उनका उद्देश्य खेती की लागत को कम करना, भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखना, रसायनमुक्त एवं गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पाद तैयार करना तथा अपने परिवार एवं उपभोक्ताओं को सुरक्षित खाद्य उपलब्ध कराना था। साथ ही वे प्राकृतिक खेती के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देना चाहते थे।नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजना से मिला तकनीकी सहयोग- वर्ष 2025 से कृषक को आत्मा परियोजना अंतर्गत नेशनल मिशन फॉर नेचुरल फार्मिंग (एनएमएनएफ) योजना से जोड़ा गया। योजना के अंतर्गत उन्होंने जागरूकता एवं ओरिएंटेशन कार्यक्रमों में भाग लिया तथा प्राकृतिक खेती के विभिन्न घटकों को तैयार करने एवं उपयोग करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने बीजामृत, जीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि प्राकृतिक कृषि आदानों को तैयार करना एवं उनका उपयोग करना सीखा।
प्राकृतिक खेती के प्रति उनकी सक्रियता एवं कार्य को देखते हुए उन्हें योजना के अंतर्गत बायो रिसोर्स यूनिट (बीआरसी यूनिट) भी प्रदान की गई। इसके माध्यम से वे प्राकृतिक कृषि आदान आसानी से तैयार कर अपने खेत में उपयोग करने के साथ-साथ आवश्यकता के अनुसार अन्य किसानों को भी उपलब्ध करा रहे हैं।विभिन्न फसलों के साथ स्वीट कॉर्न की सफल खेती- वर्तमान में श्री शिवचरण कुशवाहा द्वारा अपने खेत में विभिन्न फसलों की अंतवर्ती खेती के साथ-साथ प्राकृतिक खेती की जा रही है। कृषक द्वारा 25 डिसमिल में अदरक, तुअर, तिल्ली और बेबी कॉर्न, 75 डिसमिल में बैंगन और स्वीट कॉर्न, 75 डिसमिल में लगभग 4,000 गेंदा पौधों के साथ स्वीट कॉर्न की अंतरवर्तीय खेती एवं 2 एकड़ में मुख्य रूप से स्वीट कॉर्न की खेती की जा रही है।
स्वीट कॉर्न बना आय का प्रमुख स्रोत– श्री कुशवाहा ने 2 एकड़ क्षेत्र में स्वीट कॉर्न की खेती से अब तक उल्लेखनीय आर्थिक लाभ प्राप्त किया है। कृषक को उत्पादन में लगभग ₹60,000 कुल लागत आ रही है। उनके द्वारा कुल ₹2,70,000 के स्वीट कॉर्न अभी तक विक्रय किये जा चुके हैं, जिससे उन्हें 2 एकड़ में ₹2,10,000 का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआहै। प्राकृतिक तरीके से उत्पादित स्वीट कॉर्न की स्थानीय स्तर पर अच्छी मांग बनी हुई है। विशेष रूप से कुहिया ग्राम के शिक्षक एवं जैविक उत्पाद पसंद करने वाले उपभोक्ता उनके खेत से सीधे सब्जियां एवं स्वीट कॉर्न खरीदने के लिए आते हैं।
स्थानीय बाजार से मिला भरोसा– श्री कुशवाहा के खेत में प्राकृतिक तरीके से उत्पादित सब्जियों को स्थानीय उपभोक्ताओं का अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। ग्राम के शिक्षक, अन्य ग्रामीण एवं जैविक उत्पादों के प्रति रुचि रखने वाले किसान उनके उत्पादों को नियमित रूप से खरीदते हैं।
खेत से सीधे बिक्री के बाद बची हुई सब्जियों एवं कृषि उत्पादों का विक्रय उनके द्वारा शासन द्वारा प्रारंभ गुरैया सब्जी मंडी स्थित साप्ताहिक जैविक हाट में भी किया जा रहा है। इस प्रकार प्राकृतिक खेती से उत्पादित उपज को स्थानीय स्तर पर ही बाजार मिलने से उन्हें परिवहन एवं बिचौलियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल रही है।
प्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भरता की ओर– कृषक शिवचरण कुशवाहा का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उन्होंने खेती को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, मृदा संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण एवं बेहतर आय का साधन बनाया है। कृषक द्वारा स्वयं प्राकृतिक कृषि आदान तैयार कर उनका उपयोग कर रहे हैं और अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका प्रयास क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए यह संदेश देता है कि प्राकृतिक खेती अपनाकर एक ओर जहां मृदा उर्वरता सुधारी जा सकती है, रसायनों से मुक्ति दिलाई जा सकती है, पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है, तो वहीं दूसरी ओर अच्छी आय प्राप्त कर किसान खेती को लाभ का व्यवसाय बना सकते हैं और आत्मनिर्भर बन सकते हैं।















