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जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम की मिसाल: एक ही सीजन में लखपति बने किसान रघुवर भादे

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सतपुड़ा एक्सप्रेस छिंदवाड़ा।ग्राम चारगांव करबल, विकासखंड मोहखेड़, जिला छिंदवाड़ा मध्य प्रदेश सरकार और बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA) के संयुक्त प्रयास से संचालित जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम ने छिंदवाड़ा जिले के किसान रघुवर भादे की खेती और आमदनी, दोनों की तस्वीर बदल दी है। बदलते मौसम और अनिश्चित बारिश के इस दौर में, जहां पारंपरिक खेती हर सीजन एक जुआ बनती जा रही थी, वहीं रघुवर जी ने वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर यह साबित कर दिया कि जलवायु-अनुकूल खेती न सिर्फ टिकाऊ है, बल्कि बेहद मुनाफे का सौदा भी है।

रघुवर भादे पिछले दो वर्षों से इस कार्यक्रम से जुड़े हुए हैं। इस दौरान उन्होंने कार्यक्रम के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन में आधुनिक कृषि पद्धतियों को क्रमबद्ध ढंग से अपनाया। इसी क्रम में इस वर्ष उन्हें मिनी कस्टम हायरिंग सेंटर के माध्यम से एक अत्याधुनिक मशीन उपलब्ध कराई गई — जीरो टिलेज सह डी.एस.आर. मल्टी क्रॉप प्लांटर, जो उनकी सफलता की सबसे बड़ी कड़ी साबित हुई।तकनीक जो मिट्टी और मौसम, दोनों को संभालती हैयह मशीन बुवाई की पारंपरिक विधि से कहीं अधिक है। बिना जुताई के सीधी बुवाई की यह तकनीक जमीन की प्राकृतिक संरचना और नमी को सुरक्षित रखती है, मिट्टी के सूक्ष्म पोषक तत्वों का क्षरण रोकती है, और फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें खेत में ही संरक्षित कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है। परिणामस्वरूप, कम पानी और कम लागत में भी फसल अनियमित मौसम की मार को बेहतर ढंग से झेल पाती है

— यही जलवायु अनुकूल कृषि की मूल भावना है, जिसे यह कार्यक्रम जमीनी स्तर पर साकार कर रहा है।रघुवर जी बताते हैं, “पहले जो पैसा जुताई और मजदूरी में उड़ जाता था, अब वही मशीन की मदद से बच रहा था।” मशीन मिलते ही उन्होंने पहले अपने खेत में इसका प्रयोग किया, फिर इसका लाभ आसपास के किसानों तक भी पहुंचाया — मशीन को किराए पर देकर। इससे क्षेत्र के अन्य किसानों के खेतों में भी डीएसआर विधि से धान, जीरो टिलेज तकनीक से मक्का, और सोयाबीन की बुवाई संभव हो सकी। अपने खेत और किराए, दोनों को मिलाकर रघुवर जी ने कुल लगभग 128 एकड़ रकबे में इस एक मशीन से बुवाई पूर्ण की — जो क्षेत्र में अपने आप में एक कीर्तिमान है।

पहले ही सीजन में लखपति किसान की उपलब्धि /सीजन के अंत में जब हिसाब सामने आया, तो आंकड़ों ने सबको चौंका दिया — रघुवर भादे ने केवल एक ही सीजन में 1,21,250 रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित किया। इस उपलब्धि ने उन्हें क्षेत्र के पहले “लखपति किसान” के रूप में स्थापित कर दिया, और उनकी यह सफलता की कहानी पूरे मोहखेड़ विकासखंड में चर्चा का विषय बन गई।आज रघुवर भादे न केवल स्वयं आर्थिक रूप से सशक्त हुए हैं, बल्कि मशीन किराए पर देकर क्षेत्र के अन्य किसानों को भी जलवायु अनुकूल खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार और बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA) के सहयोग से चल रहे इस कार्यक्रम ने यह सिद्ध कर दिया है कि सही तकनीक और वैज्ञानिक मार्गदर्शन के सहारे, किसान न सिर्फ जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं, बल्कि अपनी आय को भी नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। रघुवर जी कहते हैं, “दो साल की मेहनत का असली फल इस साल मिला — और यह सफलता अब सिर्फ मेरी नहीं, पूरे गांव के लिए एक रास्ता है।”

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