रिपोर्ट: आलोक सूर्यवंशी
सतपुड़ा एक्सप्रेस दिल्ली:भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चलाए जा रहे ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को लेकर बहस तेज हो गई है।
आयोग का कहना है कि यह मृत, डुप्लिकेट और स्थानांतरित मतदाताओं को हटाकर सूची शुद्ध करने की नियमित प्रक्रिया है, जबकि आलोचकों को डर है कि इससे गरीब और प्रवासी नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
दिल्ली के आंकड़े: 31 अगस्त, 2026 की मसौदा सूची में मतदाताओं की संख्या 1.45 करोड़ से घटकर लगभग 97.53 लाख रह गई। 47.56 लाख (करीब 33%) नाम हटाए गए हैं। हालांकि, अनुपस्थित या स्थानांतरित होने का मतलब यह नहीं कि वे सभी अवैध मतदाता हैं।
अवैध प्रवासियों के दावे:
9 अक्टूबर, 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, हटाए गए नामों में देशव्यापी स्तर पर अवैध प्रवासियों की कोई ठोस पुष्टि नहीं है। केवल नाम कटने को धोखाधड़ी या विदेशी नागरिकता से जोड़ना भ्रामक है।
सुधार के प्रयास:
आयोग ने ऑनलाइन पोर्टल, विशेष शिविर और नोटिस के जरिए सुधार की व्यवस्था की है। दिल्ली में 10.28 लाख से अधिक नोटिसों का निपटारा किया जा चुका है।
सुप्रीम कोर्ट में मामला: 5 अक्टूबर को शीर्ष अदालत ने केंद्र और चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा। कोर्ट ने फॉर्म-6 में बदलाव के संबंध में रिकॉर्ड तलब किए हैं, जबकि आयोग का कहना है कि यह केवल SIR से जुड़ी एक अलग घोषणा थी।
ज़मीनी चुनौतियाँ व कानूनी पक्ष: बीएलओ (BLO) के दौरे के समय प्रवासियों का न मिलना और दस्तावेज़ों में विसंगतियां बड़ी मुश्किलें पैदा कर रही हैं। पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे और पूर्व न्यायाधीश पी.एन. रविंद्रन का मानना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप साक्ष्य-आधारित होने चाहिए और जनता को कानूनी उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए।
चुनावी शुचिता के लिए अपात्र नामों को हटाना जितना जरूरी है, उतना ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि किसी भी पात्र नागरिक का वोट न कटे।