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राष्ट्रीय एकता दिवस विशेष: सरदार पटेल का सपना और आज के भारत की चुनौतियां

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560 से अधिक रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर रखी अखंड भारत की नींव, अब एकता के साथ समावेशी विकास और सामाजिक विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी पर

रिपोर्ट:आलोक सूर्यवंशी

सतपुड़ा एक्सप्रेस नई दिल्ली। भारत 31 अक्टूबर को लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाएगा। यह दिन केवल एक महान व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को दोहराने का भी दिन है।

आजादी के बाद जब देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती सैकड़ों रियासतों को एक संघ में जोड़ने की थी, तब सरदार पटेल ने अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता और कूटनीतिक कौशल से इतिहास रचा। उन्होंने वी.पी. मेनन के साथ मिलकर 560 से अधिक रियासतों के भारतीय संघ में विलय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। अधिकांश रियासतों का विलय बातचीत और सहमति से हुआ, जबकि जूनागढ़ और हैदराबाद जैसे मामलों में राष्ट्रीय हित में निर्णायक कदम उठाने पड़े।

भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में पटेल ने न केवल राजनीतिक एकीकरण किया, बल्कि विभाजन के कठिन दौर में कानून-व्यवस्था, शरणार्थियों के पुनर्वास और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अखिल भारतीय सेवाओं को मजबूत बनाने में उनका योगदान आज भी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की आधारशिला माना जाता है।

एकता केवल सीमाओं से नहीं, सामाजिक विश्वास से मजबूत होती है

राष्ट्रीय एकता का अर्थ केवल देश की भौगोलिक सीमाओं को सुरक्षित रखना नहीं है। वास्तविक एकता तब मजबूत होती है, जब विभिन्न भाषा, संस्कृति, जाति, धर्म और क्षेत्र के लोग स्वयं को एक साझा राष्ट्र का हिस्सा महसूस करें।

आज भारत के सामने रियासतों के एकीकरण जैसी चुनौती नहीं है, बल्कि विकास के लाभ को देश के प्रत्येक क्षेत्र और नागरिक तक पहुंचाने की चुनौती है। सड़क, रेल, डिजिटल कनेक्टिविटी और औद्योगिक विकास के साथ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सार्वजनिक सेवाओं में समान अवसर उपलब्ध कराना भी राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी है।

केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोग, सहकारी संघवाद तथा क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान देश की एकजुटता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक संवाद के माध्यम से सुलझाना ही राष्ट्रहित में है।

आंतरिक सुरक्षा और नक्सलवाद की चुनौती

राष्ट्रीय एकता के लिए आंतरिक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण आधार है। इस वर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस के आयोजनों में सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई और प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। गृह सचिव गोविंद मोहन के अनुसार, कभी नक्सली हिंसा से प्रभावित रहे जिलों के 5,000 से अधिक लोगों की एकता नगर में भागीदारी प्रस्तावित है।

सुरक्षा बलों के जवानों ने देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया है। अनेक जवानों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनके योगदान को सम्मान देना राष्ट्र की जिम्मेदारी है। हालांकि स्थायी शांति के लिए सुरक्षा के साथ शिक्षा, रोजगार, बुनियादी सुविधाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनेगा राष्ट्रीय आयोजन का केंद्र

गुजरात के एकता नगर में स्थित 182 मीटर ऊंची स्टैच्यू ऑफ यूनिटी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। 31 अक्टूबर 2018 को राष्ट्र को समर्पित यह प्रतिमा सरदार पटेल के योगदान और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।

इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एकता नगर में सरदार पटेल को श्रद्धांजलि देंगे और राष्ट्रीय एकता दिवस परेड में शामिल होंगे। बीएसएफ, सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी सहित विभिन्न सुरक्षा बलों की टुकड़ियां परेड में भाग लेंगी।

कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, एकता झांकियां, लोक एवं शास्त्रीय नृत्य तथा सरदार पटेल के जीवन पर लाइट एंड साउंड शो भी प्रस्तावित हैं। 1 से 15 नवंबर 2026 तक भारत पर्व का आयोजन किया जाएगा, जिसमें विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संस्कृति, शिल्प, व्यंजन और विरासत प्रदर्शित की जाएगी।

युवाओं की भागीदारी से मजबूत होगी एकता

राष्ट्रीय एकता दिवस पर रन फॉर यूनिटी, एकता शपथ, निबंध प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को राष्ट्रीय एकता के विचार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

एक भारत श्रेष्ठ भारत जैसी पहल विभिन्न राज्यों के लोगों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आपसी समझ को बढ़ावा देती है। डिजिटल युग में युवाओं की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। सोशल मीडिया के माध्यम से जहां लोगों को जोड़ने का अवसर है, वहीं गलत सूचनाएं, नफरत और सामाजिक ध्रुवीकरण एकता के सामने चुनौती भी हैं।

सरदार पटेल की विरासत और वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी

सरदार पटेल का जीवन अनुशासन, दृढ़ इच्छाशक्ति, राष्ट्रीय हित और निस्वार्थ सेवा का उदाहरण है। 1991 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वर्ष 2014 से उनकी जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।

आज उनके विचारों को केवल समारोहों और नारों तक सीमित रखने के बजाय शासन, प्रशासन, सामाजिक व्यवहार और विकास की नीतियों में उतारने की जरूरत है। राष्ट्रीय एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी नागरिक एक जैसा सोचें, बल्कि यह है कि अलग-अलग विचारों और पहचानों के बावजूद सभी को समान सम्मान, अधिकार और अवसर मिलें।

सरदार पटेल ने राजनीतिक रूप से भारत को एक सूत्र में बांधने का ऐतिहासिक कार्य किया था। अब वर्तमान पीढ़ी के सामने उस एकता को लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक सद्भाव, समान अवसर, समावेशी विकास और आपसी विश्वास के माध्यम से मजबूत बनाए रखने की जिम्मेदारी है। यही लौह पुरुष को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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