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क्यों मनाया जाता है:भुजरिया-कजलिया पर्व

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राखी से जुड़ा भुजरिया-कजलिया पर्व: हरियाली, भाईचारे और वीरता का प्रतीक

सतपुड़ा एक्सप्रेस | विशेष: आलोक सूर्यवंशी

छिंदवाड़ा: रक्षाबंधन के अवसर पर मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला भुजरिया, भुजालिया या कजलिया पर्व केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि खेती-किसानी, प्रकृति, भाईचारे और लोकगाथाओं से जुड़ा अनूठा लोकपर्व है। महाकौशल क्षेत्र में भी इसकी विशेष परंपरा देखने को मिलती है। रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले मिट्टी के पात्र या पत्तों से बने दोने में गेहूं अथवा जौ के दाने बोए जाते हैं। अंधेरे स्थान पर रखकर इनकी नियमित देखभाल की जाती है और कुछ दिनों में हरे-भरे अंकुर तैयार हो जाते हैं।

खेती से जुड़ा है पर्व

भुजरिया के पीछे एक महत्वपूर्ण कृषि परंपरा भी मानी जाती है। अंकुरित गेहूं या जौ को देखकर अच्छी बारिश, हरियाली और आने वाली फसल की समृद्धि की कामना की जाती है। कुछ लोक-अध्ययनों में इसे पुराने समय में बीज के अंकुरण और फसल की स्थिति परखने की कृषि परंपरा से भी जोड़ा गया है।

आल्हा-ऊदल और चंद्रावली की लोककथा

भुजरिया पर्व की एक प्रसिद्ध लोककथा महोबा की राजकुमारी चंद्रावली और वीर आल्हा-ऊदल से जुड़ी है। लोकमान्यता के अनुसार रक्षाबंधन के समय राजकुमारी चंद्रावली अपने भाइयों से मिलने और कजलियां लेकर आने की तैयारी में थीं। इसी दौरान महोबा क्षेत्र में युद्ध की स्थिति बन गई। आल्हा और ऊदल ने युद्ध में वीरता दिखाते हुए चंद्रावली की रक्षा की।

कहा जाता है कि युद्ध और परिस्थितियों के कारण उस दिन कजलियों की परंपरा पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद कजलिया पर्व को रक्षाबंधन के अगले दिन मनाने की परंपरा विकसित हुई। हालांकि इस कथा के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग लोक रूप मिलते हैं और इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोकमान्यता और लोकगाथा के रूप में देखा जाता है।

भुजरिया देकर मिटाए जाते हैं गिले-शिकवे

पर्व के अवसर पर महिलाएं और युवतियां गीत गाते हुए भुजरिया लेकर जलस्रोतों तक जाती हैं। पूजा के बाद कुछ स्थानों पर इसका विसर्जन किया जाता है। इसके बाद लोग एक-दूसरे को भुजरिया भेंट करते हैं, गले मिलते हैं और सुख-समृद्धि की शुभकामनाएं देते हैं। इस परंपरा को आपसी भाईचारे और पुराने गिले-शिकवे भूलकर संबंध मजबूत करने का प्रतीक माना जाता है।

आज भी जीवित है लोकसंस्कृति

आधुनिक दौर में त्योहारों का स्वरूप भले बदल रहा हो, लेकिन भुजरिया-कजलिया पर्व आज भी ग्रामीण और शहरी समाज में लोकसंस्कृति की पहचान बनाए हुए है। इसमें खेत की मिट्टी, अनाज के अंकुर, पानी, हरियाली और रिश्तों को एक साथ जोड़कर किसान जीवन और सामाजिक एकता का संदेश दिया जाता है।

भुजरिया सिर्फ हरे अंकुर नहीं, बल्कि अच्छी फसल की उम्मीद, प्रकृति के प्रति सम्मान और समाज में प्रेम-भाईचारे का प्रतीक है।

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