व्यापारियों को 2000 से अधिक लेनदेन पर लग सकता है शुल्क
सतपुड़ा एक्सप्रेस | विशेष रिपोर्ट — आलोक सूर्यवंशी
सतपुड़ा एक्सप्रेस नई दिल्ली:देश में डिजिटल भुगतान की रीढ़ बन चुके UPI पर प्रस्तावित Merchant Discount Rate MDR को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच बहस तेज हो गई है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि आम UPI उपयोगकर्ताओं से कोई ट्रांजेक्शन शुल्क नहीं लिया जाएगा, जबकि प्रस्तावित व्यवस्था में कुछ निर्धारित सीमा से ऊपर के चुनिंदा व्यापारी लेनदेन पर मामूली MDR लगाने का रास्ता खोला जा रहा है।
क्या है प्रस्तावित MDR
केंद्र सरकार ने Payment and Settlement Systems Act 2007 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। सरकार के अनुसार यह संशोधन सीधे कोई शुल्क लागू नहीं करता, बल्कि भविष्य में चुनिंदा व्यापारी लेनदेन पर MDR तय करने के लिए कानूनी व्यवस्था उपलब्ध कराता है।सरकार के मुताबिक MDR लागू होने की स्थिति में यह सभी व्यापारियों या सभी UPI लेनदेन पर नहीं लगेगा। एक निश्चित सीमा से ऊपर के सीमित व्यापारी लेनदेन को इसके दायरे में लाया जा सकता है। इसकी अंतिम दर और सीमा अभी तय नहीं हुई है।कुछ रिपोर्टों में बड़े कारोबारियों के 2000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर 0.3 प्रतिशत से 0.5 प्रतिशत तक MDR की संभावित दर का उल्लेख किया गया है, लेकिन सरकार ने अभी इस दर को अंतिम रूप से घोषित नहीं किया है।
आम ग्राहक को क्या करना होगा
सरकार के अनुसार आम ग्राहक के UPI भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P लेनदेन भी मुफ्त रहेगा। सरकार का कहना है कि UPI पर होने वाले अधिकांश व्यापारी लेनदेन भी शुल्क से बाहर रहेंगे।वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी स्पष्ट किया है कि यदि MDR लागू होता है तो वह व्यापारियों पर लागू होगा, अंतिम ग्राहक पर नहीं। उनके अनुसार इससे बैंक और फिनटेक कंपनियों को UPI के बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और तकनीकी विकास में निवेश करने में मदद मिलेगी।
विपक्ष ने उठाए सवाल
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रस्तावित कानूनी बदलाव पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई कि इससे भविष्य में UPI पर शुल्क लगाने का रास्ता खुल सकता है। उनका तर्क है कि भले शुल्क व्यापारी से लिया जाए, लेकिन कारोबारी अपनी लागत का कुछ हिस्सा वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ाकर आम लोगों पर डाल सकते हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि UPI जैसे सार्वजनिक डिजिटल ढांचे के लिए अतिरिक्त शुल्क की जरूरत क्यों है।
वहीं CPIM ने प्रस्तावित MDR का खुलकर विरोध किया है
पार्टी का कहना है कि सरकार ने वर्षों तक UPI को मुफ्त डिजिटल भुगतान व्यवस्था के रूप में बढ़ावा दिया और अब उस पर शुल्क लगाने की दिशा में कदम उठाना जनता के भरोसे के खिलाफ है। पार्टी ने UPI लेनदेन को शुल्क मुक्त बनाए रखने की मांग की है।सरकार का तर्क UPI को लंबे समय तक मजबूत बनाना जरूरी सरकार का कहना है कि UPI के लेनदेन में लगातार तेज वृद्धि हुई है। जुलाई 2026 में UPI के जरिए 2366 करोड़ लेनदेन, करीब 29.9 लाख करोड़ रुपये की राशि के हुए। इतने बड़े डिजिटल नेटवर्क को साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने, तकनीकी उन्नयन और बुनियादी ढांचे पर लगातार निवेश की जरूरत है। सरकार इसी वजह से UPI के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ राजस्व मॉडल पर विचार कर रही है।
मोदी सरकार का यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) लेन-देन पर शुल्क लगाने का कदम आम लोगों पर हमला है। 6 अगस्त को सरकार ने लोकसभा में यह विधेयक पारित किया, जिससे यूपीआई ऐप्स के ज़रिए किए जाने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की मंज़ूरी मिल गई है।
यह विधेयक विपक्ष की राय सुने बिना और बिना किसी बहस के पारित कर दिया गया। इसे तानाशाही तरीके से ध्वनि मत के ज़रिए पारित कराया गया है। इस संशोधन के ज़रिए, कॉर्पोरेटों को फायदा पहुंचाने के लिए, सरकार आम लोगों से शुल्क वसूलकर उन्हें सज़ा दे रही है।
आम जनता पर असर
सत्ताधारियों का दावा है कि ये शुल्क केवल व्यापारियों से ही वसूले जाएंगे। लेकिन असल में, व्यापारियों पर लगाया गया कोई भी शुल्क आखिरकार आम लोगों के सिर पर ही पड़ेगा।
करारोपण और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026 के तहत भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में बदलाव किया गया है। अब तक, यूपीआई लेन-देन पर शुल्क लेने पर रोक लगाने वाला एक कानून था। 6 अगस्त को सरकार ने उस कानून में बदलाव किया है। अब, अगर सरकार चाहे तो शुल्क लगा सकती है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, केवल 2,000 रूपये से ज़्यादा के यूपीआई लेन-देन पर 0.3–0.5% का चार्ज लग सकता है।
डिजिटलीकरण की ओर बढ़ावा
8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा की गई थी। केंद्र सरकार ने दावा किया था कि इससे काला धन, भ्रष्टाचार और नकली नोट की समस्या खत्म हो जाएगी। असल में, इनमें से कोई भी समस्या हल नहीं हुई। इसके साथ ही, केंद्र सरकार ने लोगों को डिजिटलीकरण (जिसमें यूपीआई भी शामिल था) की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और वादा किया था कि इस पर कभी कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इस भरोसे के कारण लोगों ने इसे बड़े पैमाने पर अपनाया, भले ही शुरुआती दिनों में यह मुश्किल रहा हो।
ज़बरदस्त बढ़ोतरी
यूपीआई लेन-देन में बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है और यह हर रोज़ तेज़ी से बढ़ रहा है। नवंबर 2016 में, एक महीने में मुश्किल से 3,00,000 लेन-देन हुए थे, जिनका कुल मूल्य 100 रूपये करोड़ था। जुलाई 2026 तक, लेन-देन की संख्या बढ़कर एक महीने में 2,366 करोड़ हो गई, जिनका कुल मूल्य 30 लाख करोड़ रूपये था। इसका मतलब है कि हर दिन लगभग 79 करोड़ लेन-देन हुए, जिनका मूल्य 1 लाख करोड़ रूपये था। अगस्त 2025 और जुलाई 2026 के बीच, कुल 24,000 करोड़ लेन-देन हुए, जिनका मूल्य 330 लाख करोड़ रूपये था।
विदेशी कंपनियों का दबदबा
मुख्य सवाल यह है कि इन लेन-देनोंं को कौन नियंत्रित करता है? विदेशी कंपनियों का दबदबा है। अमेरिका की वॉलमार्ट के मालिकाना हक वाली फोनपे 50% और अमेरिका की गूगल पे 33% लेन-देन संभालती हैं। ये दोनों विदेशी कंपनियाँ मिलकर यूपीआई लेन-देन का 83% हिस्सा नियंत्रित करती हैं। दूसरी ओर, एसबीआई पे, पीएनबी पे और बड़ौदा एम पे जैसे सरकारी बैंकों के ऐप्स बाज़ार में नहीं के बराबर हैं। कुल मिलाकर, सभी सरकारी ऐप्स की हिस्सेदारी संख्या और आकार, दोनों ही मामलों में 1% से भी कम है। यह मोदी सरकार का डिज़ाइन है, जो सिर्फ़ विदेशी कंपनियों के ज़रिए ही डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।
एकाधिकार रोकने में आरबीआई की नाकामी
दो विदेशी कंपनियों के यूपीआई लेन-देन पर एकाधिकार को लेकर रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) के सामने शिकायतें की गई थीं। नवंबर 2020 में, आरबीआई ने एनपीसीआई के ज़रिए एक दिशा-निर्देश जारी किया था कि कोई भी अकेली कंपनी यूपीआई लेन-देन का 30% से ज़्यादा हिस्सा नहीं ले सकती। लेकिन असल में, फोनपे और गूगल पे इस दिशा-निर्देश का उल्लंघन कर रही हैं। आरबीआई ने इस एकाधिकार को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है ; बल्कि, उसने बार-बार इस दिशा-निर्देश को लागू करने में देरी की है और अब इसे जनवरी 2027 तक टाल दिया है। इससे यूपीआई सेवा में विदेशी कंपनियों का एकाधिकार रोकने में आरबीआई की पूरी नाकामी का पता चलता है और अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने भाजपा सरकार का चापलूसी भरा रवैया भी दिखता है।
1.2 लाख करोड़ रुपयों के शुल्क की लूट
अभी, हर महीने यूपीआई लेन-देन का कुल मूल्य 30 लाख करोड़ रूपये है। एक अनुमान के अनुसार, इनमें से लगभग 65% लेन-देन (मूल्य के हिसाब से 20 लाख करोड़ रूपये) 2,000 रूपये से ज़्यादा के हैं। अगर एमडीआर 0.5% हो, तो यूपीआई शुल्क हर महीने 10,000 करोड़ रूपये और सालाना 1.2 लाख करोड़ रूपये होगा। अगर यह 0.3% भी हो, तो भी यह हर महीने 6,000 करोड़ रूपये और सालाना 72,000 करोड़ रुपये होगा। इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा फोनेपे और गूगल पे को होगा, जिनका यूपीआई लेन-देन के कुल आकार में 83% हिस्सा है।
सरकार की नीति
वित्त वर्ष 2025–26 में, अकेले स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के ग्राहकों ने यूपीआई लेन-देन की संख्या और आकार, दोनों में 20% हिस्सेदारी निभाई थी। लेकिन एसबीआई के अपने ऐप, एसबीआई पे, का योगदान मुश्किल से 0.5% रहा। एसबीआई के ज़्यादातर ग्राहक फोनेपे या गूगल पे का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह, राष्ट्रवादी बयानों के बावजूद, मोदी सरकार की नीति ने असल में अमेरिका की विदेशी कंपनियों को बढ़ावा दिया है, और ऐसा शायद अमेरिकी दबाव में किया गया है।
क्या वे नगद (कैश) के चलन को कम कर पाए?
नोटबंदी और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने का एक मकसद नगद के चलन को कम करना था। नवंबर 2016 में 18 लाख करोड़ रूपये का नगद चलन में था, जिसमें से 15.5 लाख करोड़ रूपये को चलन से बाहर कर दिया गया था। जनवरी 2017 तक, 6.5 लाख करोड़ रूपये के नए नोट जारी होने के बाद कुल नगद का चलन 9 लाख करोड़ रूपये के स्तर पर आ गया था। सरकार का दावा था कि कई विकसित पूंजीवादी देशों की तुलना में नगद के चलन को उस स्तर पर बनाए रखना सही था। लेकिन आज, नगद का चलन 42 लाख करोड़ रूपये को पार कर गया है। इसकी एक बड़ी वजह बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और काला धन है। भारी मात्रा में नगद जमा करके रखा गया है और उसे चलन में वापस नहीं लाया गया है।
पैसे के ज़्यादा चलन की एक और वजह कई ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में बिजली, इंटरनेट और दूर संचार टावरों की कमी के कारण डिजिटल सेवाओं को न अपना पाना है। यह बात लोगों के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता को भी साफ़ तौर पर दिखाती है। मोदी सरकार, जो कई मामलों में नाकाम रही है, नगद के चलन को कम करने में भी नाकाम रही है।
सबसे महत्वपूर्ण बात अभी कोई शुल्क लागू नहीं
UPI उपयोगकर्ताओं के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि हर UPI भुगतान पर कोई नया शुल्क लागू नहीं हुआ है। प्रस्तावित संशोधन केवल MDR लगाने का रास्ता खोलता है। संसद की प्रक्रिया पूरी होने के बाद NPCI की अध्यक्षता वाली UPI and Services Steering Committee MDR की दर, सीमा और दायरा तय करेगी।
निष्कर्ष
UPI पर शुल्क को लेकर बहस का केंद्र आम ग्राहक नहीं, बल्कि बड़े व्यापारी लेनदेन हैं। सरकार का दावा है कि नागरिकों का UPI मुफ्त रहेगा, जबकि विपक्ष को आशंका है कि व्यापारियों पर बढ़ी लागत का अप्रत्यक्ष असर अंततः आम उपभोक्ता पर पड़ सकता है। अब निगाह इस बात पर है कि भविष्य में MDR की दर, लेनदेन की सीमा और कारोबारियों की श्रेणी क्या तय होती है।















