स्वीकृत जल परियोजनाओं को बनाने के लिए किसान सड़क पर कर रहे आंदोलन
पहले 20 फीट में मिलता था पानी, अब 800–1000 फीट पर भी सूख रहे ट्यूबवेल
सतपुड़ा एक्सप्रेस अमरवाड़ा (विशेष रिपोर्ट: आलोक सूर्यवंशी)क्षेत्र में वर्षों से लंबित गाडरवाड़ा जलाशय परियोजना को लेकर किसानों का आक्रोश अब सड़कों पर दिखाई देने लगा है। जलाशय निर्माण के लिए नरसिंहपुर–छिंदवाड़ा नेशनल हाईवे पर सैकड़ों किसानों ने चक्का जाम कर विरोध प्रदर्शन किया। किसानों का आरोप है कि परियोजना तो बन गई, लेकिन आज तक न जलाशय बना और न ही क्षेत्र को पानी मिला।
भू-जल का खतरनाक पतन
अमरवाड़ा क्षेत्र में भू-जल स्तर जिस गति से नीचे जा रहा है, वह आने वाले समय में गंभीर जल संकट की चेतावनी दे रहा है। स्थानीय आंकड़ों, ग्रामीण अनुभवों और मौजूदा हालात की पड़ताल करने पर सामने आया कि जहां दो-तीन दशक पहले 15 से 20 फीट की गहराई पर कुएं चलते थे, वहीं आज 800 से 1000 फीट गहरे ट्यूबवेल भी सूखने लगे हैं।
किसानों और ग्रामीणों के अनुसार, लगातार बढ़ते बोरवेल, अनियंत्रित भू-जल दोहन, वर्षा जल संचयन की कमी और घटती बारिश इसके प्रमुख कारण हैं। सिंचाई के लिए किसान पूरी तरह ट्यूबवेल पर निर्भर हो चुके हैं, लेकिन अब वे भी जवाब देने लगे हैं। इससे फसलों पर संकट खड़ा हो गया है और पीने के पानी की समस्या भी गंभीर होती जा रही है।
पुराने ग्रामीणों के अनुसार, 1990 के दशक तक साधारण कुएं और हैण्डपंप ही पूरे गांव की जरूरत पूरी कर देते थे।वर्तमान में एक-एक किसान के पास दो से तीन बोरवेल हैं, जिनमें से कई कुछ ही वर्षों में जवाब दे रहे हैं।
गहरी बोरिंग के बावजूद पानी न मिलना इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक रिचार्ज लगभग ठप हो चुका है।
भू-जल गिरावट के प्रमुख कारण
जांच में यह स्पष्ट हुआ कि भू-जल स्तर गिरने के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं:
अमरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में बड़े जलाशयों की कमी है
अनियंत्रित ट्यूबवेल खुदाई – बिना अनुमति और योजना के बोरवेल।
वर्षा जल संचयन की अनदेखी – घरों, खेतों और सार्वजनिक भवनों पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग नहीं।
तालाब और नालों का अस्तित्व खत्म होना – अतिक्रमण और रखरखाव की कमी।
बदलता खेती पैटर्न – अधिक पानी वाली फसलों की बढ़ती खेती।
किसानों की चिंता किसानों का कहना है कि हर साल नई बोरिंग पर हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं, फिर भी पानी की कोई गारंटी नहीं। सिंचाई के अभाव में फसल उत्पादन घट रहा है और लागत लगातार बढ़ रही है।
प्रशासनिक प्रयास नाकाफी जांच के दौरान यह भी सामने आया कि भू-जल संरक्षण को लेकर योजनाएं तो कागजों में हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका असर नजर नहीं आ रहा। कई गांवों में रिचार्ज स्ट्रक्चर या तो बने ही नहीं, या फिर रखरखाव के अभाव में बेकार हो चुके हैं।
किसानों की ज़मीनी हकीकत घोघरी गांव के किसान दीपक सूर्यवंशी बताते हैं—
“पहले हमारे यहां कुएं से ही सिंचाई और पीने का पानी मिल जाता था कभी 15–20 फीट की गहराई पर चलने वाले कुएं आज इतिहास बन चुके हैं। अब 700–800 फीट बोर भी मुश्किल से कुछ समय चलता है। हर साल नई बोरिंग कराना मजबूरी बन गई है।”
कोपाखेड़ा गांव के किसान पवन सूर्यवंशी बताते है स्थिति और भी गंभीर है।
“मेरे खेत में 900 फीट गहरा बोरवेल कराया गया था, लेकिन अब वह भी पूरी तरह खाली हो चुका है। इतनी महंगी बोरिंग के बाद भी पानी न मिले तो किसान क्या करे