आयुर्वेद के अनुसार प्रत्येक ऋतु परिवर्तन के दौरान अलग-अलग बीमारियों का प्रकोप
सतपुड़ा एक्सप्रेस छिन्दवाड़ा:आयुर्वेद रोग विज्ञान के साथ-साथ जीवन का विज्ञान भी है। इसका मुख्य प्रयोजन रोगी के रोग को दूर करने के साथ ही स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य को भी स्वस्थ बनाये रखना है। इसी सिध्दांत पर स्वस्थ व्यक्ति को हमेशा के लिये स्वस्थ रखने के संबंध में ऋतु संधि पर विशेष जोर दिया गया है। हमारे ऋषि मुनियों ने सदियों पहले आयुर्वेद की रचना की थी जो आज के परिप्रेक्ष्य में भी सटीक और कारगर है। ऋतु संधि के माध्यम से आहार-विहार सहित विभिन्न प्रकार की बीमारियों का दोष निवारण किया जा सकता है ।
ऋतु संधि अर्थात वर्तमान ऋतु का अंतिम सप्ताह तथा आने वाले ऋतु का प्रथम सप्ताह को ऋतु संधि कहते हैं। लोक पुरुष साम्य सिध्दांत से प्रत्येक महाभूत जो वातावरण में है वही हमारे शरीर में है, इसलिए प्रकृति में होने वाले परिवर्तन का हमारे शरीर पर सदैव प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद मतानुसार ऋतु संधि पर हमारे वातावरण में होने वाले परिवर्तन के कारण शरीर पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे हमारे शरीर का बल, इम्युनिटी कम हो जाती है। जैसे ही ऋतु परिवर्तन का समय आता है तो ऋतु संधि काल में विभिन्न तरह की बीमारियां एकदम से बढ़ जाती हैं। इस समय त्वचा के रोग, जुकाम, बुखार, अतिसार आदि विकार, पाचन शक्ति को कमजोर करते हुए बढ़ जाते हैं।
तीन ऋतु संधि, प्रत्येक में परिवर्तन के दौरान अलग-अलग बीमारियों का प्रकोप
बसंत ऋतु संधि- यह संधि चैत्र-वैशाख अर्थात मार्च-अप्रैल में होती है। इस वातावरणीय मौसम परिवर्तन के समय दमा, अस्थमा, खांसी, बुखार, जी मचलना, भारीपन, भूख न लगना, कब्ज आदि रोग अचानक से बढ़ जाते हैं। इससे बचाव के लिए हल्का भोजन व सुपाच्य का सेवन और नियमित व्यायाम करना चाहिये। इसके अलावा पंचकर्म विधि में बताये शोधन जैसे आयुर्वेद दवाइयों से वमन अर्थात उल्टी करवाना, नस्य, कुंजल क्रिया आदि से इन बीमारियों से निजात पा सकते हैं।
वर्षा ऋतु संधि- यह संधि जुलाई-अगस्त के समय होती है और इस दौरान जोड़ों का दर्द, गठिया, बदन दर्द, हाथ पैरों का सुन्न होना, अतिसार, पेट संबंधी विकार, भूख ना लगना, मलेरिया आदि रोग बढ़ जाते हैं। वर्षा ऋतु में वात दोष के शमन के लिए पंचकर्म का एक भाग बस्ति लेना चाहिये। बस्ति विभिन्न प्रकार की आयुर्वेद दवाइयों की सहायता से तथा आयुर्वेदिक तेलों के माध्यम से दो प्रकार की बनाते है। एक अनुवासन बस्ति जिसमें खाना खाने के बाद विभिन्न प्रकार की आयुर्वेदिक तेलों से दी जाती है। दूसरा आस्थापन बस्ति जिसे क्वाथ द्रव्य, शहद, सेंधा नमक, तिल तेल से बनाकर भूखे पेट दी जाती है। बस्ति को अर्ध्द चिकित्सा बताया गया है और यह वात रोग का नाश करती है।
शरद ऋतु संधि- यह संधि शरद ऋतु के समय होती है । इसमें पित्त प्रकोप होता है जिसके द्वारा रक्त विकार, सर दर्द, बुखार, बदन दर्द, खट्टी डकार, बच्चों का बार-बार बीमार पड़ना, बच्चों को बार-बार खांसी होना, जुकाम होना, दस्त लगना, हमेशा बुखार आना, श्वास रोग, जुकाम, एलर्जी, सुबह उठते ही छींके आना आदि लक्षण यकायक सामने आते हैं। शरद ऋतु के आगमन के समय बुजुर्ग शरद पूर्णिमा के दिन खीर का सेवन करते थे। इससे पित्त का शमन होता है। खीर का विशेष विधान है, इसे चंद्रमा की सोलह कलाओं से संतृप्त रात भर रखी जाकर सुबह उठते ही खाना चाहिये। शरद ऋतु में प्राकृत रूप से पित्त का प्रकोप होता है, इसलिए शरद ऋतु के आगमन पर हमें विरेचन अर्थात दस्त रक्त मोक्षण की क्रिया करवानी चाहिये।
दो ऋतुओं के संगम के दौरान बीमारियों से बचाव की सलाह- आयुर्वेद के अनुसार दो ऋतुओं के संगम के दौरान बीमारियों से बचाव के लिये ऋतु संधि में हल्का आहार-विहार लेकर रसायन का सेवन करना चाहिये जिससे हम हमेशा स्वस्थ रह सकें। आयुर्वेद वात, पित्त, कफ को सभी रोगों का मूल मानता है। हमें अपने दोषों के अनुसार उनका शोधन करवाना चाहिये, इसलिए पंचकर्म की सहायता से ऋतु संधि पर ऋतु शोधन बहुत जरूरी है। लोक कहावत में भी सावन में दूध, भाद्रपद में छाछ और कार्तिक मास में दही का सेवन नहीं करना चाहिये। चैत्र के महीने में जब ऋतु परिवर्तन होती है तो लोग जुलाब लेते हैं। यह हमारे बुजुर्गों द्वारा परंपरागत ज्ञान का आगे से आगे तक प्रवाह होता है तथा सभी लोग इसका अनुसरण करते थे, लेकिन समय के साथ हमने ऋतु संधि और उस पर होने वाले रोगों पर ध्यान नहीं दिया। इस वजह से बार-बार नई-नई बीमारियों को आमंत्रण दे रहे हैं। जिला चिकित्सालय छिंदवाड़ा के आयुष विंग में पंचकर्म की समस्त क्रियायें उपलब्ध हैं जिसका जिले के नागरिक लाभ ले सकते हैं ।आलेख-डॉ.नितिन टेकरे, आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारीआयुष विंग, जिला चिकित्सालय, छिंदवाड़ा
डॉ.रश्मि का देश मे एकमात्र राष्ट्रीय स्तर पद पर हुआ चयन
छिन्दवाड़ा। जिले के नाम एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। जिले की जानी मानी आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी डॉ. रश्मि पवन नेमा का चयन नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद जयपुर मे एम.एस प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग मे हुआ है।सम्पूर्ण भारत मे ऑल इंडिया सर्विस कोटा आल इंडिया आयुष पोस्ट ग्रेजुएट प्रवेश परीक्षा मे यह मात्र एक पद था।जिसमे छिन्दवाड़ा की बेटी और आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी डॉ.रश्मि पवन नेमा का चयन हुआ है। ये छिन्दवाड़ा जिले के लिए भी प्रथम मौका है जब यहां से आयुर्वेद के क्षेत्र मे बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। जिला आयुष एवं चिकित्सा अधिकारी डॉ.दत्तात्रेय भदाड़े एवं योग प्रशिक्षक डॉ.पवन नेमा सहित जिले के आयुर्वेद जगत ने डॉ.रश्मि नेमा को इस उपलब्धि पर बधाई एवं शुभकामनायें दी हैं। डॉ. रश्मि नेमा ने अपनी इस कामयाबी का श्रेय परिवार और गुरुजनों के मार्गदर्शन को दिया है।गौरतलब है कि डॉ रश्मि नेमा छिन्दवाड़ा के माल्हनवाड़ा मे विगत सात वर्षोंं से आयुष विभाग मे अपनी सेवायें दे रही हैं।

डॉ रश्मि नेमा















