सतपुड़ा एक्सप्रेस छिंदवाड़ा।माटी, मेहनत और मुस्कान: BISA-CIMMYT और म.प्र. सरकार के साथ मिलकर परासिया विकासखंड, के जमनियाजेठू गांव से निकली यह कहानी दर्शाती है कि कैसे म.प्र. सरकार और BISA-CIMMYT का ‘जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम’ किसानों के चेहरे पर मुस्कान ला रहा है।छिंदवाड़ा जिले की मिट्टी में एक खामोश बेचैनी बरसों से पल रही थी। जिले के कई हिस्सों में बेमौसम बारिश, फरवरी-मार्च से ही तपने लगती धूप और साल-दर-साल गिरता भूजल स्तर—किसान अपनी आंखों के सामने अपने पुरखों की खेती को हांफते हुए देख रहे थे।
श्रीमती ओम कुमारी विश्वकर्मा जी के घर पे साल में केवल दो ही फसलें—खरीफ में मक्का और रबी में गेहूं—लेते थे, और गर्मी के महीनों में खेत खाली पड़े रहते, मानो धरती भी थककर सुस्ता रही हो। इसी बदलती जलवायु के बीच मध्य प्रदेश शासन और बोरलाग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA), जबलपुर के संयुक्त प्रयासों से चलाये जा रहे ‘जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम’ प्रदेश के नौ जिलों में उम्मीद की नई किरण लेकर पहुंचा, और छिंदवाड़ा जिला इस बदलाव की अगली कतार में खड़ा हो गया।गांव में जब बिसा के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग की टीमें किसानों से मिलने पहुंचीं, तो सबसे पहले तकनीक अपनाने के लिए आगे आने वालों में जमनिया जेठू गांव की श्रीमती ओम कुमारी विश्वकर्मा का नाम शामिल था। खेती को हमेशा से पुरुषों का काम माना जाता रहा है, और एक महिला का खेत के फैसलों में आगे बढ़कर बोलना आसान नहीं था। पर ओम कुमारी जी ने हिम्मत जुटाई, वैज्ञानिकों से बैठकर बात की, सवाल पूछे, और धीरे-धीरे अपने खेत को एक जीती-जागती प्रयोगशाला में बदल डाला।

#*Increase in cropping intensity and addition of third crop*—पहले जिस खेत को गर्मी में देखकर मन उदास हो जाता था, ओम कुमारी जी ने उसी सूनी धरती में उम्मीद बोने की ठानी। रबी के बाद खाली पड़े समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने तीसरी फसल के रूप में मूंग को अपने फसल चक्र में जोड़ा। इससे उनकी क्रॉपिंग इंटेंसिटी (फसल सघनता) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई—सीमित भूमि से वर्षभर में मिलने वाला उत्पादन और मुनाफा बढ़ा, परिवार की आय में एक नया सहारा जुड़ा, और खेत व संसाधनों का पूरे वर्ष कुशल उपयोग संभव हुआ। मूंग जैसी दलहनी फसल जोड़ने से एक वैज्ञानिक फायदा भी मिला: इसकी जड़ों की ग्रंथियां वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करती हैं, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति लौटी और अगली मक्के की फसल के लिए खेत पहले से बेहतर तैयार हुआ।
#*जीरो टिलेज, अवशेष प्रबंधन और ऑर्गेनिक मल्चिंग*–—गेहूं कटाई के बाद परंपरागत रूप से खेत को दो-तीन बार जोता जाता था, जिससे मिट्टी की नमी उड़ती थी और डीजल पर हजारों रुपये खर्च होते थे—यह खर्च हर साल परिवार के बजट पर भारी पड़ता था। ओम कुमारी जी ने आधुनिक जीरो टिलेज मशीन अपनाई और बिना जुताई के गेहूं के खड़े ठूंठों के बीच सीधे मूंग की बुवाई कराई। खेत में बची पराली को जलाने के बजाय वहीं छोड़ा गया, जिसने मिट्टी पर एक प्राकृतिक चादर—’ऑर्गेनिक मल्चिंग’ और सुव्यवस्थित अवशेष प्रबंधन (Residue Management) का काम किया। इससे धूप सीधे मिट्टी पर नहीं पड़ी, नमी बनी रही, और खरपतवार को उगने के लिए धूप ही न मिलने से दवाओं का खर्च भी बचा। पराली के बीच से फूटते नन्हे हरे अंकुर देखकर ओम कुमारी जी की आंखों में जो चमक आई, वह किसी भी वैज्ञानिक रिपोर्ट से कहीं ज्यादा कुछ कहती थी। *जल संरक्षण और संतुलित पोषण प्रबंधन** गर्मी में जहाँ आमतौर पर मूंग को पांच-छह बार सींचना पड़ता था, वहीं मल्चिंग की वजह से मिट्टी में नमी लंबे समय तक टिकी रही और बेहद कम सिंचाई में ही काम चल गया—यह जल संरक्षण छिंदवाड़ा जिले के गिरते भूजल स्तर के लिए उम्मीद की किरण बनकर आया। साथ ही बीसा वैज्ञानिकों की सलाह पर पोषक तत्वों का संतुलित एवं सटीक प्रयोग किया गया, जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुधरा। जलवायु अनुकूल किस्म ‘मूंग P 1641’ के चयन ने मार्च-जून की तेज गर्मी को सहते हुए फसल को सुरक्षित रखा।इन सभी जलवायु अनुकूल तकनीकों को अपनाकर ओम कुमारी जी ने 4 क्विंटल प्रति एकड़ मूंग का रिकॉर्ड उत्पादन प्राप्त किया, जिसमें लागत न्यूनतम रही और मुनाफा अधिकतम हुआ। जब कटाई के बाद उन्होंने अपने हाथों में सुनहरी-हरी मूंग की फलियां भरकर देखीं, तो उनकी आंखों में जो सुकून था, वह बरसों की मेहनत का सिला था।

जीरो टिलेज गेहूं: एक और भरोसा-जगाती सफलता*––ओम कुमारी जी के हौसले ने यहीं रुकना नहीं सीखा था। उन्होंने अपने खेत के एक हिस्से में जीरो टिलेज विधि से गेहूं की बुवाई भी कराई। परिणाम देखकर सभी चौंक गए—परंपरागत विधि की तुलना में जीरो टिलेज से बोए गए गेहूं का उत्पादन करीब 30 प्रतिशत ज्यादा रहा। इतना ही नहीं, खेत की जुताई न करने से शुरुआती खेत तैयारी की पूरी लागत भी बच गई, यानी एक ही फैसले से मुनाफा दोगुना हुआ—उपज भी बढ़ी और खर्च भी घटा। यह नतीजा छिंदवाड़ा जिले के उन तमाम किसानों के लिए एक भरोसेमंद संदेश बनकर सामने आया है जो अब तक जीरो टिलेज को लेकर आशंकित थे। ओम कुमारी जी का यह अनुभव साबित करता है कि सही वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ अपनाई गई नई तकनीक जोखिम नहीं, बल्कि समृद्धि का रास्ता है।
*पूरे जिले के लिए एक रोल मॉडल*—–आज ओम कुमारी विश्वकर्मा सिर्फ एक किसान नहीं, बल्कि जमनिया जेठू से निकलकर पूरे छिंदवाड़ा जिले की सैकड़ों महिलाओं और किसान परिवारों के लिए एक सशक्त ‘स्मार्ट किसान’ और जीती-जागती प्रेरणा बन चुकी हैं। परासिया से लेकर जिले के दूसरे विकासखंडों तक, उनकी कहानी सुनकर कई किसान अब अपने खेतों में तीसरी फसल, जीरो टिलेज और मल्चिंग को अपनाने का मन बना रहे हैं। उनकी यह यात्रा दिखाती है कि जब एक महिला के हौसले को आधुनिक विज्ञान, वैज्ञानिक फसल-चक्र प्रबंधन और सरकारी नीतियों का साथ मिलता है, तो सूखी और तपती धरती भी सोना उगलती है—और यह सोना अब अकेले जमनिया जेठू का नहीं, पूरे छिंदवाड़ा जिले का सपना बन चुका है।















