**क्लाइमेट चेंज पर भारी पड़ी ‘जीरो टिलेज’ तकनीक: सतपुड़ा एक्सप्रेस छिंदवाड़ा। जिले के ग्राम सलैया के प्रगतिशील किसान यदुराम रघुवंशी ने बरसों से खेतों को बदलते देखा था। मौसम का मिजाज अब पहले जैसा नहीं रहा था—बारिश कभी भी आ जाती, फरवरी आते-आते ही धूप तीखी होने लगती और जमीन का पानी हर साल थोड़ा और नीचे खिसक जाता। दादा-परदादा के जमाने से चली आ रही पारंपरिक खेती से अब न तो उपज वैसी मिल रही थी और न ही सुकून।फिर एक दिन गांव में बीसा (BISA), सिमिट (CIMMYT) और मध्य प्रदेश कृषि विभाग की टीम ‘जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम’ (CRA) की उम्मीद लेकर पहुँची।
वैज्ञानिकों ने यदुराम जी को समझाया कि जब मौसम बदल रहा है, तो हमें भी बदलने की जरूरत है। बस, यहीं से शुरू हुई यदुराम जी के एक साहसिक फैसले की कहानी। उन्होंने तय किया कि वे अपने खेत को एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला बनाएंगे, ताकि पूरा इलाका बदलाव की नई राह देख सके।
*बिना जुताई के खेतों में आई ‘क्रांति’*यदुराम जी ने वैज्ञानिकों की सलाह पर **’जीरो टिलेज’** (बिना जुताई की खेती) अपनाने का फैसला किया। यह उनके परिवार के पारंपरिक तौर-तरीकों से बिल्कुल अलग था। धान की कटाई के तुरंत बाद, बिना ट्रैक्टर चलाए और बिना मिट्टी को पलटे, उन्होंने सीधे गेहूं की बुवाई कर दी।धान के बचे हुए डंठल और अवशेषों को जलाने के बजाय खेत में ही छोड़ दिया गया। इस पराली ने मिट्टी पर एक ‘प्राकृतिक चादर’ (मल्चिंग) का काम किया। नतीजा यह हुआ कि तीखी धूप सीधे मिट्टी पर नहीं पड़ी, जमीन की नमी लंबे समय तक बची रही, खरपतवार कम उगे और सबसे बड़ी बात—जुताई और डीजल का भारी-भरकम खर्च पूरी तरह बच गया।
**पाँच किस्मों का परीक्षण*तकनीक तो तय हो गई, लेकिन अगला बड़ा सवाल था—बदलते मौसम की मार झेलने के लिए कौन सा बीज सबसे मजबूत साबित होगा? इसके लिए यदुराम जी के इसी खेत पर एक अनोखी परीक्षा रखी गई। एक ही मैदान, एक जैसा पानी और एक ही दिन 4 आधुनिक किस्मों और 1 पारंपरिक किस्म को बोया गया।फसल बढ़ी, बालियां आईं और यदुराम जी खुद रोज़ खेत जाकर दानों की चमक और वजन को परखते रहे। आखिरकार जब कटाई का दिन आया, तो नतीजों ने पूरे गांव को हैरान कर दिया:| गेहूं की किस्म | उपज (क्विंटल/एकड़) | पारंपरिक किस्म से कितनी ज्यादा? ||—|—|—|| 🌾 **DBW 327** | **28** | **+6 क्विंटल (शानदार बढ़त)** || 🌾 **DBW 303** | **26** | **+4 क्विंटल** || 🌾 **DBW 187** | **24** | **+2 क्विंटल** || 🌾 **HI 1636** | **22** | **बराबर** || 🌾 **पारंपरिक किस्म** | **22** | **— (आधार स्तर)** |### एक नया सवेरा: पूरे क्षेत्र को मिली दिशा**DBW 327** ने प्रति एकड़ 28 क्विंटल की बंपर पैदावार देकर इस परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया।
वह भी तब, जब लागत पहले से काफी कम लगी थी। यदुराम जी के इस मुनाफे ने गांव के दूसरे किसानों की आंखें खोल दीं।जो किसान कल तक बिना जुताई की खेती को शक की नजर से देख रहे थे, आज वे यदुराम जी के खेत की मिट्टी को छूकर देख रहे हैं। यदुराम रघुवंशी की यह कहानी सिर्फ एक अच्छी फसल की नहीं, बल्कि इस बात की मिसाल है कि अगर किसान हौसला दिखाए और विज्ञान का हाथ थाम ले, तो बदलता मौसम भी उसकी तरक्की नहीं रोक सकता।















