सतपुड़ा एक्सप्रेस टीकमगढ़। बुंदेलखंड का वह कोना जहाँ पथरीली ज़मीन और अनिश्चित मानसून मिलकर किसान के सपनों को साल-दर-साल तोड़ते रहते हैं। जतारा ब्लॉक के शिवप्रताप सिंह परमार जी के लिए खरीफ के बाद रबी सीजन हमेशा एक हिसाब-किताब से शुरू होता था—जुताई का किराया, बीज का दाम, डीजल, मजदूरी। इतना लगाओ, फिर भी उत्पादन वही परंपरागत 17–18 क्विंटल।
मुनाफे की जगह घाटे की थकान।फिर एक दिन गाँव में आए BISA और मध्य प्रदेश शासन के संयुक्त जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के प्रशिक्षण ने उनकी सोच में एक नया बीज बोया।जब विज्ञान ने खटखटाया दरवाजाBISA के कृषि विशेषज्ञों ने शिवप्रताप जी को जीरो टिलेज और DBW 303 किस्म के बारे में खेत पर खड़े होकर समझाया। कोई जुताई नहीं — सीधे मशीन से बीज और खाद जमीन में। मिट्टी की नमी बनी रहेगी, ऊपरी उपजाऊ परत सुरक्षित रहेगी और लागत कम होगी।
“बिना जोते खेती?” — मन में शक था। लेकिन मध्य प्रदेश शासन और BISA के सहयोग से मशीन और बीज निःशुल्क उपलब्ध थे। बस एक बार हिम्मत करनी थी।खेत ने दिया जवाबरबी 2025–26 में DBW 303 की बुआई जीरो टिलेज मशीन से हुई। जमीन में न ट्रैक्टर चला, न रोटावेटर — बस एक मशीन और एक उम्मीद।जब थ्रेशर से दाने निकले तो आँकड़ा था — 22 क्विंटल प्रति एकड़। परंपरागत खेती से 20 प्रतिशत अधिक। शिवप्रताप जी की आँखें भर आईं।विवरण| परंपरागत खेती| जीरो टिलेज (DBW 303)उत्पादन (प्रति एकड़)| लगभग 18 क्विंटल| 22 क्विंटल (+20%)लागत बचत| अधिक खर्च (जुताई)| ₹2,500–3,000 कमपानी की बचत| 4–5 सिंचाई| 1–2 सिंचाई की बचतमिट्टी की सेहत|
जुताई से कमजोर| मिट्टी संरक्षण«“पहले जुताई में ट्रैक्टर का खर्च, फिर बीज, फिर सिंचाई — हर साल बजट टूट जाता था। BISA के वैज्ञानिकों ने जीरो टिलेज की बात की तो पहले यकीन नहीं हुआ। लेकिन जब 22 क्विंटल की फसल घर आई — तब जाना कि विज्ञान से दोस्ती कितनी जरूरी है।”»— शिवप्रताप सिंह परमार, किसान, जतारा (टीकमगढ़)गाँव के लिए एक मिसालजब फसल की खबर फैली तो पड़ोसी गाँवों के किसान शिवप्रताप जी के खेत देखने आने लगे। वही लोग जो कभी “बिना जोते खेती” पर हँसते थे, अब DBW 303 और जीरो टिलेज के बारे में सवाल पूछ रहे थे।शिवप्रताप जी आज जतारा ब्लॉक के ‘जलवायु मित्र किसान’ बन चुके हैं — BISA और मध्य प्रदेश शासन के इस कार्यक्रम के एक जीवंत प्रमाण।मुख्य सीखजीरो टिलेज से जुताई खर्च में बचत, मिट्टी का संरक्षण और DBW 303 किस्म से 20 प्रतिशत अधिक उत्पादन — तीनों मिलकर बनाते हैं जलवायु अनुकूल खेती की नींव।

(जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम, BISA–CIMMYT एवं मध्य प्रदेश शासन के सहयोग से)















