ट्रेड यूनियन आंदोलन का बदलता स्वरूप

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सतपुड़ा एक्सप्रेस छिंदवाड़ा।12 फरवरी को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा बुलाए गए “भारत बंद” को देशव्यापी बंद के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिसका उद्देश्य संगठित श्रमिक शक्ति का प्रदर्शन करना था। हालांकि, वास्तविकता में कई राज्यों से आई रिपोर्टों में अधिकांश शहरों में सामान्य व्यावसायिक गतिविधियां जारी रहने, सार्वजनिक परिवहन के संचालन और केवल कुछ स्थानों पर आंशिक औद्योगिक व्यवधान की स्थिति सामने आई। कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में भी कई इकाइ‌यों में आंशिक उपस्थिति दर्ज की गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि व्यापक स्तर पर इस बंद का प्रभाव सीमित रहा।

यह स्थिति भारत के श्रम बाजार की गहरी संरचनात्मक वास्तविकताओं को दर्शाती है। आज भी लगभग 85-90 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं, जहां न तो स्थायी रोजगार सुरक्षा है और न ही औपचारिक श्रम अधिकारों का लाभ। इसके साथ ही बड़ी संख्या में लोग स्व-रोजगार, ठेका श्रम, छोटे व्यापार या प्लेटफॉर्म आधारित गिग इकोनॉमी में कार्य कर रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में पारंपरिक ट्रेड यूनियन मॉडल-जो बड़े कारखानों और दीर्घकालिक सामूहिक सौदेबाजी पर आधारित था-अब सीमित वर्ग तक ही प्रभावी रह गया है।

12 फरवरी के बंद ने यह भी दिखाया कि कई क्षेत्रों में बंद का प्रभाव स्वैच्छिक भागीदारी से अधिक अवरोधों, प्रतीकात्मक प्रदर्शन और प्रशासनिक कार्यवाही तक सीमित रहा। आम नागरिकों के लिए ऐसे बंद अक्सर एकजुटता के बजाय असुविधा और आर्थिक नुकसान का कारण बनते हैं। यात्रियों को परेशानी, छोटे व्यापारियों को नुकसान, आवश्यक सेवाओं में बाधा और दैनिक मजदूरी पर निर्भर लोगों की आय में कटौती जैसी समस्याएं सामने आती हैं। परिणामस्वरूप, बंद को अब लोकतांत्रिक संघर्ष के प्रभावी साधन की बजाय रोजमर्रा की जिंदगी में बाधा के रूप में देखा जाने लगा है।इस दूरी के पीछे कई कारण हैं। रोजगार के स्वरूप में तेजी से बदलाव आया है, जबकि यूनियनों की रणनीतियां अपेक्षाकृत पारंपरिक ढांचे तक सीमित बनी हुई हैं। यूनियन नेतृत्व मुख्यतः सार्वजनिक उपक्रमों और पुराने औद्योगिक क्षेत्रों में केंद्रित है, जहां संस्थागत पकड़ तो मजबूत है लेकिन व्यापक प्रतिनिधित्व कमजोर है। साथ ही यूनियनों के बीच विभाजन भी संदेश और प्रभाव दोनों को कमजोर करता है। आधुनिक रोजगार की अनिश्चितता भी श्रमिकों को लंबे आंदोलन से दूर रखती है।

लेख का निष्कर्ष यह है कि वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था में बदलाव के इस दौर में भारत के पास विकास का बड़ा अवसर है। ऐसे समय में ट्रेड यूनियनों के लिए यह आवश्यक है कि वे केवल बंद और विरोध तक सीमित न रहकर कौशल विकास, सामाजिक सुरक्षा, लाभों की पोर्टेबिलिटी, कार्यस्थल सुरक्षा और विवाद समाधान जैसे विषयों पर ठोस एवं व्यावहारिक प्रस्ताव रखें। तभी वे श्रमिक हितों के साथ-साथ राष्ट्रीय विकास के साझेदार बनकर अपनी प्रासंगिकता और प्रभाव को बनाए रख सकेंगे।

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