Home AGRICULTURE मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा इसलिए तरीका भी बदलना होगा…

मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा इसलिए तरीका भी बदलना होगा…

WhatsApp चैनल लिंक WhatsApp ग्रुप जॉइन करें

शून्य जुताई से सफलता की ओर बढ़ते कदम,जलवायु अनुकूल कृषि परियोजना • बौरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया •

सतपुड़ा एक्सप्रेस छिंदवाड़ा।मंडला की धरती नर्मदा की गोद में मध्यप्रदेश के हृदय में, जहाँ नर्मदा नदीअपनी चाँदी-सी धारा लेकर बहती है, जहाँ सतपुड़ा और मैकाल की पहाड़ियाँ धरती को हरा आँचल ओढ़ाती हैं — वहाँ बसा है मंडला जिला। यह धरती उपजाऊ है, पर यहाँ की खेती पूरी तरह आसमान के मिज़ाज पर निर्भर है। जब बारिश मेहरबान हो तो फसलें लहलहाती हैं, जब रूठ जाए तो खेत सूने पड़ जाते हैं।

ग्राम रामपुर भी इसी मंडला की एक छोटी-सी बस्ती है। यहाँ के ज़्यादातर घर खेती पर टिके हैं — धान, गेहूँ, मूंग। पर पिछले कुछ बरसों से मौसम बेईमान हो चला था। कभी अगस्त में ऐसी बाढ़ कि खेत डूब जाएँ, कभी नवम्बर तक गर्मी और अनियमित वर्षा कि गेहूँ की बुआई का सही वक्त ही न मिले। यह बदलाव था — **जलवायु परिवर्तन** का, जो धीरे-धीरे इस जिले की खेती को अंदर से खोखला कर रहा था।

### **लोचन जी की ज़िंदगी — मेहनत बहुत, फल कम**रामपुर के **श्री लोचन भावरें** उन किसानों में से हैं जो अपनी ज़मीन से बेहद प्यार करते हैं। सुबह अँधेरे उठना, खेत की मेड़ पर बैठकर फसल को निहारना — यही उनकी दुनिया थी। पर यह प्यार और मेहनत जब मुनाफे में नहीं बदलता, तो दिल टूटता है। सालों से एक ही तरीके से खेती करते आए। अक्टूबर में धान काटो, फिर खेत जोतो, तीन-चार बार ट्रैक्टर चलाओ, तब जाकर गेहूँ की बुआई हो पाती थी। इतनी मेहनत के बाद भी गेहूँ में 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ से ज़्यादा नहीं होता था। ट्रैक्टर का किराया, बीज का पैसा, खाद का खर्चा — सब निकालने के बाद हाथ में कुछ खास नहीं बचता था और ऊपर से मौसम का चक्कर। लोचन जी कहते हैं कि उनके पिताजी के ज़माने में नवम्बर आते-आते ठंड पड़ जाती थी गेहूँ के लिए एकदम सही वक्त। अब वो ठंड नवम्बर के अंत तक नहीं आती और कभी कभी अनियमित वर्षा। बुज़ुर्गों का हिसाब-किताब बेकार हो चुका था — मौसम बदल गया था, पर खेती का तरीका नहीं। पराली जलाने की समस्या भी थी। धान की फसल कटने के बाद खेत में भारी मात्रा में पराली बचती थी। उसे जलाना पड़ता था — वरना जुताई मुश्किल होती थी। धुआँ उठता, आँखें जलतीं, पड़ोसी नाराज़ होते। और मिट्टी के सूक्ष्म जीव — जो धरती की असली ताकत हैं — वो जल जाते। साल-दर-साल ज़मीन कमज़ोर होती जा रही थी।

### **एक मुलाकात जिसने सब बदल दिया**अक्टूबर 2024 की एक सुबह। लोचन जी अपने खेत की मेड़ पर बैठे थे कि गाँव में कुछ अजनबी चेहरे आए। बौरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया और कृषि विभाग, मंडला की एक टीम थी — जलवायु अनुकूल कृषि परियोजना के तहत। वे उन किसानों से मिल रहे थे जो बदलाव के लिए तैयार हों। टीम ने लोचन जी की बात ध्यान से सुनी। उनकी हर समस्या — मौसम की मार, पराली की परेशानी, बढ़ती लागत, कम उत्पादन — सब नोट किया। और फिर टीम ने लोचन जी को बताया कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में परंपरागत खेती काफी नहीं है। मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा — इसलिए तरीका भी बदलना होगा, उन्होंने एक ऐसी बात कही जो लोचन जी को पहले अजीब लगी: जब BISA के वैज्ञानिक ने कहा कि पराली में ही सीधे गेहूँ बो सकते हो — बिना जोते, बिना जलाए — तो पहले तो यकीन नहीं हुआ। मन में आया कि यह भला कैसे होगा? पर उन्होंने मेरे खेत में ही दिखाया, हाथ से समझाया। उनकी बातों में इतना भरोसा था कि हिम्मत हो गई और यह बदलाव कोई जोखिम नहीं था — यह विज्ञान था, जो दुनिया भर में आज़माया जा चुका था।

### **शून्य जुताई — एक नई शुरुआत**नवम्बर में धान की कटाई हो चुकी थी। खेत में पराली बिछी थी। पहले यही पराली जलाई जाती थी — पर इस बार बीसा के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने रोक लिया। वैज्ञानिको और अधिकारियो के साथ मिलकर पहली बार **शून्य जुताई** — की विधि अपनाई। एक खास मशीन हैप्पी सीडर आई जो पराली के बीच से रास्ता बनाते हुए बीज को सीधे मिट्टी में बो देती थी। न जोतना, न जलाना। पराली वहीं रही — ज़मीन की चादर बनकर।खेत की तैयारी जो पहले पाँच-सात दिन लेती थी, वो एक-दो दिन में हो गई। ट्रैक्टर का खर्च आधा। मज़दूरी कम। समय बचा। और सबसे बड़ी बात — बुआई सही वक्त पर हुई, जो गेहूँ की अच्छी फसल के लिए सबसे ज़रूरी है।पराली ज़मीन पर बिछी रही — उसने मिट्टी की नमी को महीनों सँभाले रखा। सर्दियों में जब ठंड पड़ी, पराली की चादर ने मिट्टी का तापमान बनाए रखा। सिंचाई कम लगी। खरपतवार भी कम निकले। धीरे-धीरे लोचन जी को समझ आया — यह पराली तो जाया करने की चीज़ नहीं, **यह तो सोना थी!

**### **फसल पकी — और दिल भी खिला**फरवरी 2025। गेहूँ की फसल पकने लगी। लोचन जी रोज़ खेत में जाते, बालियाँ गिनते, दाने देखते। कुछ तो अलग था इस बार — बालियाँ भरी-भरी थीं, पौधे मज़बूत खड़े थे।जब कटाई हुई — तो जो आँकड़ा आया, उसने लोचन जी की आँखें चमका दीं। जहाँ पहले **10-12 क्विंटल प्रति एकड़** मिलता था, इस बार **15-16 क्विंटल प्रति एकड़** गेहूँ हुआ। **तीस प्रतिशत से ज़्यादा की उछाल!** तो पहले खुद यकीन नहीं हुआ। घरवाले खुश, पड़ोसी हैरान। यही वो पल था जब लगा कि ज़िंदगी बदल सकती है — बस तरीका बदलना होता है। और यह सब कम खर्च में, कम मेहनत में।सिर्फ गेहूँ ही नहीं — धान और मूंग की फसलों में भी **10 से 15 प्रतिशत** की बढ़ोतरी दर्ज़ की गई। ज़मीन धीरे-धीरे जीवंत होने लगी। मिट्टी में नमी रहने लगी। कार्बन स्तर बेहतर हुआ। **वह ज़मीन जो साल-दर-साल कमज़ोर होती जा रही थी, अब फिर से साँस लेने लगी थी।

**### **जलवायु की मार — और उससे लड़ने का हुनर**लोचन जी अपने अनुभव से एक बड़ी बात समझे — खेती की असली दुश्मन अब सिर्फ कीट या रोग नहीं, बल्कि **बदलता मौसम** भी है। मंडला जैसे इलाकों में जहाँ खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर हो, वहाँ एक हफ्ते की देरी भी पूरी फसल बर्बाद कर सकती है। जीरो टिलेज ने लोचन जी को एक बड़ा फायदा यह दिया कि बुआई जल्दी हो जाती है — मशीन से, पराली के बीच से। इसका मतलब है कि अगर मौसम एक-दो हफ्ते अनिश्चित भी रहे, तो भी सही समय पर तुरंत बुआई हो सकती है। पानी बचाने की तकनीक ने सूखे के वक्त फसल को बचाया। और पराली की चादर ने मिट्टी की नमी को संजोए रखा और खरपतवार भी नहीं उगने दिया

### **एक किसान — पूरे गाँव की उम्मीद**जब रामपुर के लोगों ने लोचन जी के खेत में भरी-भरी बालियाँ देखीं — तो सवाल आने लगे। पहले दो-चार किसान आए, फिर और। सब जानना चाहते थे — **”भाई, यह कैसे किया?”**लोचन जी ने कभी किसी को निराश नहीं किया। अपना खेत दिखाया, तकनीक समझाई, BISA की टीम से मिलवाया। वे एक किसान से **एक शिक्षक** बन गए — अपने गाँव के लिए, अपने इलाके के लिए। गाँव में पराली जलाने की प्रवृत्ति कम हुई। नई तकनीकों पर भरोसा बढ़ा। महिला किसानों की भी रुचि जागी — क्योंकि जीरो टिलेज में मेहनत कम है। एक आदमी के साहस ने पूरे गाँव की सोच बदल दी।

  • WhatsApp चैनल लिंक WhatsApp चैनल जॉइन करें