भारत की स्वतंत्रता के दौरान भारतीय ईसाइयों ने अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और देशभक्ति का परिचय दिया

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सतपुड़ा एक्सप्रेस न्यूज डेस्क।जब हम भारत की स्वतंत्रता के उनहत्तर (79) वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं, तब ईसाई समुदाय के पास राष्ट्र के प्रति अपने योगदान पर गर्व करने के पर्याप्त और उचित कारण हैं। संख्या में कम होने के बावजूद, भारतीय ईसाइयों ने राष्ट्र-निर्माण के हर क्षेत्र—राजनीति, समाज, धर्म और शिक्षा—में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसके बावजूद, यह समुदाय अक्सर दुष्प्रचार का शिकार रहा है। ऐसे में भारतीय ईसाइयों का एक महत्वपूर्ण दायित्व है कि वे लोगों के मन से यह गलत धारणा दूर करें कि ईसाई समुदाय राष्ट्रविरोधी या देश से विमुख है। देशभक्ति हमेशा से ईसाई मूल्यों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

भारतीय ईसाई राष्ट्रीय भावना से गहराई से जुड़े रहे और उन्होंने संवैधानिक तरीकों को अपनाने को प्राथमिकता दी।भारतीय ईसाई नेताओं ने भारतीय राष्ट्रवाद के उद्देश्यों को आकार देने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद भी ईसाई समुदाय युवाओं को धर्मनिरपेक्षता, सार्वभौमिकता और समानता जैसे मूल्यों की शिक्षा देने में सक्रिय रहा। चाहे सशस्त्र बल हों, सिविल सेवाएं, शिक्षा, पुलिस, विज्ञान, चिकित्सा, खेल या समाज सेवा—ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ भारतीय ईसाइयों ने अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज न कराई हो।

वे देश के अनेक जमीनी आंदोलनों में भी सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं।निस्संदेह, भारतीय ईसाइयों का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र के पुनर्निर्माण में योगदान सराहनीय रहा है। भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध पहला बड़ा विद्रोह 1857 का स्वतंत्रता संग्राम था। उस समय कई भारतीय ईसाई ब्रिटिश प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत थे। प्रारंभ में वे ब्रिटिश सरकार की वास्तविक मंशा से अनभिज्ञ थे और अपने देश के प्रति निष्ठावान रहे। बाद में जब उन्हें यह एहसास हुआ कि अंग्रेज उन्हें केवल अपने हितों के लिए उपयोग कर रहे हैं, तब उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध करना शुरू कर दिया।

स्वराज आंदोलन के दौरान भारतीय ईसाइयों ने एक ज्ञापन प्रस्तुत कर यह स्पष्ट किया कि वे जनता की राष्ट्रीय मांगों का पूर्ण समर्थन करते हैं और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय भारतीय ईसाई बंबई (अब मुंबई) में एकत्र हुए और पूर्ण स्वराज की मांग के समर्थन में कई प्रस्ताव पारित किए। उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत को अपनाया तथा बड़े पैमाने पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।इस आंदोलन के प्रमुख ईसाई नेताओं में जे. सी. कुमारप्पा प्रमुख थे, जिन्होंने लोगों से स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का आग्रह किया। इसके अलावा थेवारथुडियिल टाइटस, जे. पी. रोड्रिग्स तथा अन्य अनेक ईसाई नेताओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अनेक ईसाई महिलाओं ने भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान दिया। कुमारप्पा के लेखन से ब्रिटिश सरकार इतनी नाराज़ हुई कि उन्हें जेल भेज दिया गया। अन्य ईसाई नेता मसिल्लामणि को भी इसी प्रकार की सजा का सामना करना पड़ा।भारत की स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति या समाज के किसी एक वर्ग के प्रयासों से प्राप्त नहीं हुई। यह सभी वर्गों और समुदायों के लोगों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम थी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ईसाई नेताओं के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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