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अन्नदाता के साथ विश्वासघात! MSP के नाम पर मात्र 10 रुपये की ‘भीख’, चुनावी वादे निकले हवाई

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मक्का और धान उत्पादक किसान हुये निराश

सतपुड़ा एक्सप्रेस छिंदवाड़ा[रिपोर्ट:आलोक सूर्यवंशी] :अन्नदाता के साथ विश्वासघात! MSP के नाम पर मात्र 10-12 रुपये की ‘भीख’ से मक्का और धान उत्पादक किसान निराश हुये है खेती-किसानी को लाभ का धंधा बनाने का दम भरने वाली सरकार ने एक बार फिर आंकड़ों की बाजीगरी से किसानों को छला है। खरीफ सीजन 2026-27 के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ने सरकार के किसान विरोधी चेहरे को उजागर कर दिया है।

मक्का में महज 10 रुपये धान मे 72 रूपये और मूंग में सिर्फ 12 रुपये की वृद्धि करके सरकार ने यह साबित कर दिया है कि उसे खेतों में पसीना बहाने वाले किसान की हकीकत से कोई सरोकार नहीं है।

मक्का किसान: पिछले साल का घाटा और अब ये ‘भद्दा मजाक’मक्का उत्पादक किसानों के लिए पिछला साल (2025-26) किसी काले अध्याय से कम नहीं था। जब लागत 2000 रुपये के पार जा रही थी, तब मजबूरन किसानों को अपनी फसल मंडियों में 1400 से 1500 रुपये प्रति क्विंटल के औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ी जबकि सरकारी समर्थन मूल्य 2400 रूपये था किन्तु सरकार ने समर्थन मूल्य पर मक्का की खरीदी ही नहीं की ।हकीकत: पिछले साल प्रति क्विंटल 500-600 रुपये का सीधा घाटा सहने वाले किसान को उम्मीद थी कि सरकार इस बार बड़ा मरहम लगाएगी।

विश्वासघात: सरकार ने मात्र 10 रुपये बढ़ाकर घाटे से जूझ रहे किसान के जख्मों पर नमक छिड़क दिया है। क्या 10 रुपये में किसान की मेहनत और लागत का हिसाब पूरा हो जाएगा?

धान पर ₹3100 का वादा: जुमला साबित हुई घोषणासबसे बड़ा आक्रोश धान उत्पादक किसानों में है। चुनाव के समय बड़े-बड़े मंचों से किसानों से वादा किया गया था कि धान की खरीदी 3100 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर की जाएगी। लेकिन आज जब सरकारी आदेश सामने आया, तो वह वादा कहीं नजर नहीं आया।”वोट लेने के लिए 3100 रुपये का सब्जबाग दिखाया गया, लेकिन सत्ता मिलते ही सरकार अपनी घोषणाओं को भूल गई। आज धान की एमएसपी को उस वादे के करीब भी नहीं ले जाया गया। यह सरासर वादाखिलाफी और धोखाधड़ी है।” — किसान यूनियन प्रतिनिधिमूंग की खेती से मोहभंग की तैयारीमूंग, जिसे दलहन की महत्वपूर्ण फसल माना जाता है, उस पर भी सरकार की बेरुखी साफ दिखी। मात्र 12 रुपये की वृद्धि यह दर्शाती है कि सरकार को न तो पोषण की चिंता है और न ही किसान की आय दोगुनी करने की।ग्राउंड जीरो के कड़वे सवाल:लागत का हिसाब कहाँ?

किसान कहीं स्लाट बूकिंग तो कहीं खाद के E टोकन बूकिंग से परेशान है डीजल, खाद और मजदूरी के दाम 20%-30% बढ़ गए, तो मक्का एमएसपी में 1% से भी कम वृद्धि क्यों?वादाखिलाफी का जिम्मेदार कौन? चुनाव में किया गया धान खरीदी ₹3100 का वादा आखिर किस ‘ठंडे बस्ते’ में चला गया?मंडी की लूट पर चुप्पी क्यों? जब मक्का ₹1400 में बिक रहा था, तब सरकार ने दखल क्यों नहीं दिया और अब सिर्फ ₹10 बढ़ाकर क्या जताना चाहती है? कागजी आंकड़ों और 10-12 रुपये की मामूली बढ़त से अब अन्नदाता को बहलाया नहीं जा सकता। चुनावी घोषणापत्रों में किए गए वादे यदि धरातल पर नहीं उतरते, तो आने वाले समय में सरकार को खेतों से उठने वाले इस आक्रोश का जवाब देना होगा।

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